KOLARAS में बनी घंटियां कोटा से कानपुर एवं भोपाल तक सुनाई देती है, 200 साल का है सफर

Bhopal Samachar
राहुल शर्मा @ कोलारस। शिवपुरी जिले की तहसील कोलारस से 8 किमी दूर स्थित ग्राम राई की लुहारपुरा बस्ती में पिछले 200 वर्ष से चले आ रहे जानवरों एवं मवेशियों के गले में पहनाई जाने वाली घंटियां बनाए जाने का हुनर रूपी कारोबार का जलवा अभी भी बरकरार है। राई गांव में बनाई जाने वाली छोटी-बड़ी हर प्रकार की घंटियां राजस्थान के कोटा, बारां, यूपी के कानपुर, झांसी एवं एमपी के भोपाल, इंदौर तक आज भी मशहूर हैं।

इन शहरों में ऑर्डर के मुताबिक माल सप्लाई करने में राई गांव के दो दर्जन परिवार पुश्तैनी धंधे को बरकरार रखे हुए हैं। कोलारस के ग्राम राई की लुहारपुरा बस्ती में गाय-बछड़ा आदि के गले में पहनाई जाने वाली घंटियां बनाने का कार्य दो दशक से भी अधिक समय से निरंतर चल रहा है, फर्क सिर्फ इतना है कि पहले लुहारपुरा बस्ती के घर-घर में यह काम होता था परन्तु वर्तमान समय में लकड़ी व कोयला की कमी के चलते इस कारोबार में मांग की कमी होने से अब सीमित लोगों तक ही यह काम सिमट कर रह गया है।

राई गांव की लोहारपुर बस्ती में एक समय था जब सुबह से लेकर देर शाम तक अधिकांश घरों में छेनी-हथौड़ा की आवाज दूर-दूर तक सुनाई देती थी, जहां अनुपयोगी लोहे को अग्नि में पिघला कर घंटिया बनाई जाने का कारोबार चलता था मगर यह पुश्तैनी धंधा तो अभी भी चल रहा है लेकिन घंटियां बनाने के मटेरियल में महंगाई का तड़का लग जाने से इसमें कमी आई है।

लुहारपुरा बस्ती में 50 रुपए से लेकर 500 रुपए में बिकने वाली घंटियों का निर्माण किया जाता है और राजस्थान के कोटा, यूपी के कानपुर, आगरा मप्र के भोपाल तक आर्डर के मुताबिक थोक में सप्लाई किया जाने का कारोबार बदस्तूर जारी है। चूंकि 2 दशक पहले तक राई गांव में 200 से अधिक कारीगर घंटियां बनाने का धंधा करते थे परन्तु लकड़ी, कोयले का अभाव एवं महंगाई व मशीनीकरण के युग में इस कारोबार में कमी तो आई है लेकिन कारीगरों की इस पुश्तैनी हुनर का जलवा इतने सालों बाद भी बरकरार है।

सफाई लाने घंटियों पर चढ़ाया जाता है पीतल का पानी

हुनर के इस धंधे में लगे लोगों को कोयले की आग में लोहे को पिघलाने के बाद टांकी-हथोड़ों व अन्य औजारों की मदद से घंटियों का निर्माण करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है। सुबह से शाम तक 75 से अधिक छोटी व बड़ी साइज की घंटियाँ एक परिवार के दो-तीन सदस्यों द्वारा बनाकर तैयार कर ली जाती हैं। लोहे की घंटियों पर चमक एवं सफाई लाने के लिए पीतल का पानी चढ़ाया जाता है जिससे बारिश व धूप से यह खराब नहीं होती और देखने में चमकदार लगती हैं।

मवेशी बाहुल्य गांवों व शहरों में इनकी मांग अत्यधिक रहती है, कोलारस में स्थानीय स्तर पर घंटियों की मांग भले ही कम हो और लोग कला की कद्र न समझ रहे हों लेकिन प्रदेश के बड़े शहरों से लेकर राजस्थान एवं यूपी के शहरों में राई के इन कारीगरों की कला की आज भी बहुत कद्र है और स्थानीय कारीगर उनके ऑर्डर के अनुसार ही माल तैयार कर डिलेवरी भेजते हैं।

स्टेट काल से चला आ रहा है यह धंधा: राई गांव में मवेशियों के गले में पहनाई जाने वाली घंटियां बनाने का धंधा ग्वालियर के सिंधिया राजघराने के समय से चला आ रहा है। पुराने समय में लकड़ी व कोयले की उपलब्धता के चलते लुहारपुरा बस्ती के हर घर में यह काम होता था और बड़े पैमाने पर घंटियां बनाई जाती थीं। जिन्हें मध्यप्रदेश के साथ-साथ अन्य प्रदेशों में भेजा जाता था। लेकिन लकड़ी व कोयला महंगी कीमत पर मिलने एवं लुहारों के इस पुश्तैनी धंधे को शासन की ओर से किसी प्रकार की मदद मुहैया नहीं होने के कारण इस धंधे में गिरावट आई है। परन्तु राई गांव की लुहारपुरा बस्ती में घंटियां बनाने टांकी हथौड़ों की गूंज दिन भर गूंजती रहती है। इस धंधे में जी तोड़ मेहनत करने के बावजूद लोग पुश्तैनी परंपरा को अपनाए हुए हैं।

क्या कहते हैं कारीगर...

सस्ती एवं महंगी सभी प्रकार की घंटिया बनाई जाती हैं। राजस्थान के केलवाड़ा, बारां व झांसी तक मांग के अनुसार घंटियां बनाकर भेजी जाती हैं। पहले जंगल होने से लकड़ी व कोयला गांव में ही मिल जाते थे, आज जंगल नहीं होने से कोयला महंगी रेट पर खरीदना पड़ रहा है। जिससे लागत बढ़ गई है।
बंटी ओझा, कारीगर राई गांव
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हमारी तीन पीढ़ियां यह कारोबार करती आ रही हैं। इसलिए हम पुश्तैनी कार्य को बरकरार रखे हुए हैं। पहले की अपेक्षा अब मांग व मुनाफा कम है। यदि शासन हमारी कला की कद्र समझे और मदद करे तो प्राचीन समय से करते आ रहे धंधे को विस्तृत रूप भी दिया जा सकता है।
रामगोपाल ओझा, कारीगर राई गांव
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