शिवपुरी का धाम: मणि-महेश्वर की पूजा के लिए लेनी पड़ी नाग देवता से अनुमति- Shivpuri News

काजल सिकरवार @ शिवपुरी। मप्र के पर्यटक के नक्शे पर पर्यटन नगरी की पहचान बनाने वाली शिवपुरी जिले का शिवपुरी नाम इसलिए रखा होगा की यह कई प्राचीन शिव धाम है। आज हम आपको ऐसे  शिव-धाम   की मानसिक यात्रा करा रहे है,जहा स्वयं भू भोलेनाथ जोगी के रूप में मणि-महेश्वर के रूप में स्थापित है। मणि महेश्वर की पूजा करने के लिए नग देवताओं से अनुमति लेनी पड़ी थीं,उनके गुप्त और चमत्कारी रहस्यो को समेटे प्रकृति की गोद में बसा यह सप्तमणि स्थान है। इस शिव धाम से अभी शिवपुरी जिले के मात्र 1 प्रतिशत लोग ही परिचित हैं।

पोहरी विधानसभा के अंतर्गत आने वाले गांव भटनावर से दक्षिण दिशा की ओर 5 किमी की दूरी स्थित सप्तमणि स्थान है जिसे आम बोलचाल की भाषा मे सतमणि कहा जाता हैं। यहां बोला जाता है कि जोगी तेरा रूप निराला सतमणि में डेरा डाला। इस स्थान महाभारत काल से जुड़ा हुआ है,यह पांडवों ने कुंती माता सहित द्रोपदी के साथ सतमणि में स्थित शिवलिंग की पूजा कर विजयी होने का आर्शीवाद प्राप्त किया था। यह  नागेश्वर महादेव  भी विराजमान है,नागेश्वर को बनाने में जिस पत्थर का उपयोग किया है वहां पाषाण युग का है नागेश्वर महादेव के कारण इस स्थान की प्राचीनता का पता चलता हैं।

पांडवों ने किया था बियाबान जंगल में सात मणियो का निर्माण

सप्तमणि के महंत ने बताया कि यहां जंगल में सात मणियो का निर्माण पांडवों ने किया था। इसलिए इस स्थान का नाम सप्तमणि हुआ। एक मणि में स्वयं जोगी शिवलिंग के रूप में विराजमान है जिन्हें मणिमहेश्वर कहा जाता है,वही क्रमंश में मणियेा में मां राजेश्वरी,लक्ष्मी और सरस्वती विराजमान है। बाल हनुमान एक मणि में विराजित है। नागेश्वर महादेव और भैरवनाथ और मां गायत्री की प्रतिमा इस स्थान पर है। वही दो गुफा है। एक नीचे की ओर जहां नदी वह रही है उसे सिद्धों की गुफा कहा जाता है। एक गुफा मां गायत्री की गर्भगृह के नीचे है। सिद्धों की गुफा के विषय में बताया जाता है कि इसका एक मुख पवा पर निकलता है। अब समय गुजरने के साथ छोटी छोटी मणियों हटा मंदिरों का निर्माण हो चुका हैं।

यह है मणि महेश्वर की कथा पूजा करने के लिए लेनी पड़ी नाग देवता से आज्ञा

मणि महेश्वर की विषय में कहा जाता है कि मणिमहेश्वर स्थापित शिवलिंग नहीं है यह सिद्धों की तपस्या के कारण जमीन से निकला है,इसलिए इसे जोगी बाबा भी कहते है,लेकिन जब यहां वनवास के दौरान पांडव आए और उन्होंने इस शिवलिंग की पूजा की और विजयी होने का आर्शीवाद प्राप्त किया इसके बाद उन्होंने यहां सातमणियो का निर्माण किया था।

मंदिर पर उपस्थित महंत जी ने बताया कि हमारे दादा गुरु के गुरू जब इस स्थान पर आए थे उन्होने इस स्थान को खोजा। मणि महेश्वर एक छोटी से मणि में विराजमान थे,और उन पर सांप लिपटे रहते थे वह नाग देवता से हाथ जोडकर आज्ञा लेते थे की महादेव की पूजा करनी है और आप से मेरे को डर लगता है आप अपने स्थान को पधारे,इस निवेदन के बाद नाग देवता शिवलिंग से हटजाते थे उसके बाद महोदव की पूजा होती थी यह क्रम वर्षों तक चलता रहा है।

यहां उपस्थित है स्वयं भू राजराजेश्वरी,सिंह आने जगा है यहां दर्शन करने

ऐसा बताया जाता है कि राजराजेश्वरी की प्रतिमा की स्थापना नहीं की जाती हैं। वह स्वयं भू प्रकट होकर विराजमान होती है। एक छोटी से मणि में लगभग 12 इंच की प्रतिमा में तीन देवी यहां विराजमान है। जिन्हे राजराजेश्वरी,लक्ष्मी और माता सरस्वती की प्रतिमा कहा जाता है। इस स्थान पर जाग्रत रूप में यह देवी स्थापित है और इनकी प्रतिमाओ को मणि महेश्वर के मंदिर के  नीचे से जमीन से निकाला गया था। स्थानीय ग्रामीणों कहना है कि हमने पूर्व में सुना था राजराजेश्वरी के आगे एक विशाल सिंह बैठा रहता है,अब पिछली 3 नवरात्रि से यहां एक विशाल सिंह अब स्थान पर आने लगा है। यह घटना साल में दो बार घटित होती है नवरात्रि होती है।

सतमणि स्थान से लगा हुआ डांग बर्वे में निवास करने वाले एक बुजुर्ग का कहना हैं कि जब भी आप शेर के समीप होंगे तो उस वातावरण में सड़े मांस की दुर्गंध आती हैं,लेकिन जब भी यहां राजराजेश्वरी का सिंह आता है तो वातावरण में सुगंध होती हैं।

पाषाण युग के पत्थर पर बने है नागेश्वर महादेव

ऐसा बताया जाता है कि सतमणि में विराजे नागेश्वर महादेव का शिवलिंग के निर्माण में पाषाण पत्थर का प्रयोग किया हैं। घनघोर जंगल में यह स्थान होने के कारण यह जहरीले कीड़े यह हर समय निकलते रहते हैं,बिच्छु हमेशा मंदिरेा में देखे जा सकते है सर्प प्रतिदिन मंदिरो के दीवालो ओर दरवाजो पर देखे जा सकते हैं,लेकिन यहां चींटी तक ने किसी को नहीं काटा हैं।

गुफाओं का है विचित्र खेल,श्वेत सर्प जो मणिधारी है वह देता है दर्शन

यह दो गुफा है जिसमे एक गुफा को सिद्ध बाबा की गुफा कहा जाता है। यह गुफा मंदिर के सबसे नीचे जहां नदी बहती है उसके पास है। इस गुफा के विषय मे कहा जाता हैं कि इस गुफा का दूसरा छोर पवा पर निकलता है गुफा तक आप पहुंच सकते है सिद्धो की दर्शन कर सकते है। यह गुफा पहाड़ को काटकर बनाई गई है। वही दूसरी गुफा मां गायत्री के गर्भगृह के नीचे है,इस गुफा में कहा जाता है कि इसमें बैठकर साधना की जाती थी,लेकिन अब इस गुफा को एक पत्थर लगाकर बंद कर लिया गया हैं।

इस स्थान पर सिद्धो का डेरा है,या यू कह लो की यहां जाग्रत सिद्ध है और वह यहां भक्तों को श्वेत सर्प के रूप में दर्शन देते है। इस श्वेत सर्प के साथ मणि रहती है जो हमेशा चमकती है। यह साल में कई बार स्थान पर रात के समय में अलौकिक प्रकाश देखा जाता रहा है। माना जाता है कि सिद्ध बाबा है। इस स्थान पर वहां यहां की व्यवस्था का जायजा लेने आते रहते है। इस कारण ही किसी भी जहरीले कीड़े ने आज तक यहां किसी को नहीं काटा हैं।

स्थान का वातावरण साधना प्रिय लोगों के लिए स्वर्ग समान है

सतमणि स्थान सबसे अधिक सिद्ध बाबा की गुफा के लिए प्रसिद्ध है ऐसा माना जाता है कि यहां आज भी सिद् पुरूष अपने स्थूल शरीर लेकर साधना करते है। उनकी साधना के कारण ही यहां दूर दूर से लोग शांति में विशेष पूजा पाठ करने आते है। यह साधना का तीर्थक्षेत्र है। यहां साधना के लिए मां गायत्री,राजराजेश्वरी और भैरव नाथ की प्रतिमा है। यहां विशेष प्रकार की साधना करने के लिए दूर दूर से साधक आते है। यहां खासकर नवदुर्गा ओर सावन के माह में साधक आकर रहते है।

बाल हनुमान के सेवा में रहते थे दो सर्प

महंत ने बताया कि जब तक मरे गुरू महंत श्रीजागेश्वर दास महाराज जीवित थे तब तक नीचे बाल हनुमान के मंदिर मं दो सर्प हमेशा संकट मोचन की सेवा में रहते थे,अब भी वह कभी कभी देखे जा सकते हैं।

साधना के कारण कट जाता है इंसान दुनिया से

इस स्थान के मेन गेट से आप नीचे की ओर जाते है तो सबसे नीचे तक जाने के लिए आपको लगभग 200 सीढ़ियों से उतरना होगा। उपर मोबाइल नेटवर्क आते है,लेकिन जैसे जैसे आप नीचे उतरेंगे वैस ही आपके मोबाइल से नेटवर्क गायब हो जाऐगें। उसी प्रकार आप आप जैसे जैसे नीचे की ओर उतरेंगे आपका मन भी शांत हो जाएगा आपके मन का नेटवर्क भी दुनिया से कटने लगेगा,आपको शांति मिलने लगेगी। मंहत ने बताया यहां इसलिए ऐसा होता है कि यह साधना का सिद्ध क्षेत्र है ओर तपस्वी लोगों की तपस्या के प्रभाव के कारण यहां के वातावरण में आ लौगिग आनंद की अनुभूति होती है,इसलिए ससांद से अपना ध्यान करने लगता है इसलिए ही उच्चकोटि के साधक यहां साधना करने आते हैं।