Shivpuri News- पहली बार आत्मनिर्भर महिला अध्यक्ष

अशोक कोचेटा-शिवपुरी।
 नपाध्यक्ष पद पर कभी एनजीओ चलाने वाली संघर्षशील महिला नेत्री गायत्री शर्मा की निर्विरोध रूप से ताजपोशी हुई है। चुनाव के 12 घंटे पहले तक नगर पालिका अध्यक्ष पद की दौड़ में उनका नाम कहीं नहीं था। धनबल का बोलबाला चल रहा था। ऐसा लग रहा था कि नगर पालिका अध्यक्ष जो भी बनेगा वह निर्विरोध बने अथवा चुनाव के जरिए।

लेकिन उसकी गांठ से 3 से 5 करोड़ रुपए खर्च होना तय हैं। लगता भी क्यों नहीं, पार्षदों की लाखों में बोलियां लग रही थीं। राजनैतिक तिकड़में, जोड़तोड़, उठापटक, दांवपेंच, षडयंत्रकारी राजनीति सब उफान पर थीं। लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनी कि धनबल, बाहुबल, राजनैतिक बल सब बौने हो गए। इन परिस्थितियों का सृजन किसी और ने नहीं बल्कि विधि ने ही किया था।

शायद ईश्वर को मंजूर नहीं था कि जिस शिवपुरी नगर पालिका की शुरूआत होनी जा रही है, उसका शुभारंभ ही काले धन से हो। विधाता ने ऐसी परिस्थिति निर्मित की कि दावेदार हाथ मलते रह गए और नपाध्यक्ष पद के लिए एक भी पैसा खर्च न करने वाली गायत्री शर्मा निर्विरोध रूप से अध्यक्ष बन गई। गायत्री शर्मा की जीत से इस तरह से एक मायने में जनभावनाओं की जीत हुई है।

गायत्री शर्मा और सरोज व्यास की जीत भी जनभावना की जीत इस संदर्भ में है कि योग्य महिला जनप्रतिनिधियों का चयन हुआ है। शहर के अधिकांश नागरिकों की सोच थी कि यदि नपाध्यक्ष पद का चुनाव यदि करोड़ों रूपए खर्च करके होगा तो कैसे निर्वाचित अध्यक्ष की प्राथमिकता शहर के विकास की होगी। सबसे पहले तो उसका पूरा ध्यान अपनी खर्च की गई राशि को ब्याज सहित वसूलने में होगा।

इस बार के नपाध्यक्ष पद के चुनाव में सिर्फ यहीं एक सकारात्मक बात नहीं है। बल्कि बहुत सी सकारात्मक बातें निकलकर सामने आई हैं और इससे कम से कम शहर विकास और नगर पालिका के योग्य जनप्रतिनिधि की निश्चित रूप से आशा तो बंधी है।

हरि इच्छा बलवान! शिवपुरी नगर पालिका चुनाव के संदर्भ में यह कहावत सटीक सिद्ध हो रही है। अध्यक्ष पद के चुनाव में किसी की भी नहीं चली। न धनबल, न बाहुबल और न ही राजहठ। सारी ताकत गौण हो गईं। लोकतांत्रिक पद्धति के इस चुनाव में यदि ये ताकत जोर मारती तो कदापि गायत्री शर्मा का चुनाव नहीं हो पाता। न तो उनके पास लक्ष्मी की ताकत थी और न ही कोई ऐसा राजनैतिक रसूख, जो उन्हें सत्तासीन कर दे।

राजनीति के अनुभव में भी वह अन्य महिला पार्षदों से कमतर थीं। निर्वाचित महिला पार्षदों में कुछ पार्षद तो दो.दो, तीन.तीन बार निर्वाचित होकर परिषद में पहुंची थीं। लेकिन गायत्री शर्मा पहली बार ही निर्वाचित हुई थीं और पार्षद पद के चुनाव में भी उनकी जीत की आसान कल्पना नहीं की जा रही थी। लेकिन भाग्य भी कुछ होता है और इसका महत्व पुरुषार्थ से अधिक है यह इस चुनाव का निष्कर्ष है।

अध्यक्ष पद के लिए पार्षदों के निर्वाचन के बाद दीप्ति भानू दुबे का पलड़ा भारी इसलिए नजर आ रहा था क्योंकि उनके पाले में प्रदेश सरकार की वरिष्ठ मंत्री और स्थानीय विधायक यशोधरा राजे सिंधिया खड़ी थीं। लेकिन दीप्ति भानू दुबे को एक दम से वार्ड क्रमांक 26 से निर्वाचित सरोज रामजी व्यास से चुनौती मिल गई। सरोज व्यास के पति रामजी व्यास मंडी सचिव पद से सेवानिवृत हुए हैं।

लेकिन राजनीति और तिकड़मों के वह उस्ताद हैं और उन्हें भाजपा में केन्द्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का समर्थक माना जाता है। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष बीडी शर्मा कॉलेज के दिनों में बताया जाता है कि उनके जूनियर हुआ करते थे। पार्षदों की गिनती में भी रामजी व्यास का पलड़ा भारी हो गया था। चुनाव होते तो निश्चित रूप से भाजपा की फजीहत होती कि स्पष्ट बहुमत के बाद भी वह निर्विरोध निर्वाचन नहीं करवा पा रहीं।

निर्विरोध निर्वाचन की मंशा के कारण भाजपा आलाकमान को हस्तक्षेप करना पड़ा और इस हस्तक्षेप का परिणाम यह हुआ कि न तो दीप्ति दुबे और न ही सरोज व्यास अध्यक्ष पद की भाजपा प्रत्याशी होंगी। फिर कई नाम चर्चा में आए लेकिन सहमति बनी गायत्री शर्मा पर। गायत्री शर्मा बिना एक धेला खर्च किए नपाध्यक्ष बन गईं और यहीं कारण रहा कि जीत के पश्चात वह बार-बार भावुक होती रहीं और उनकी आंखों से अश्रुओं की धार लगातार बहती रही।

यह आंसू उन्हें बार-बार याद दिलाएंगे कि उन्हें नगर पालिका अध्यक्ष पद गिफ्ट में मिला है और इस पद की गरिमा के साथ न्याय करने की अब उनकी जिम्मेदारी है। नगर पालिका अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के चुनाव में सकारात्मक बात यह भी है कि पहली बार महिला जनप्रतिनिधियों का सही चुनाव हुआ है। अभी तक अधिकांश महिला जनप्रतिनिधि अपने पतियों के सहारे राजकार्य का संचालन करती थीं।

लेकिन जिस तरह की झलक गायत्री शर्मा और सरोज व्यास ने निर्वाचित होने के बाद पत्रकारों के समक्ष पेश की है। उससे ऐसा लगता है कि उनके अपने विचार हैं और वह स्वयं निर्णय लेने में सक्षम हैं। पहली बार शिवपुरी नगर पालिका में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों पदों पर महिलाएं आसीन हुई हैं।

इससे परिषद का संचालन निश्चित रूप से गरिमापूर्ण होगा, ऐसी आशा की जा सकती है। सिर्फ एक आशंका अवश्य नजर आ रही है कि अलग.अलग गुटों में होने के बाद कहीं दोनों में टकराव न हो। लेकिन शहर हित में उन्हें अपनी निजी भावनाओं को तिलांजलि देकर विकास में जुटना होगा, यहीं शहर की जनता की अभिलाषा है।