सिंधिया को दी गई दिग्विजय सिंह को उनके गढ़ में घेरने की जिम्मेदारी: राजघरानो की 200 साल है पुरानी अनबन - Shivpuri News

अशोक कोचेटा @ शिवपुरी। भारतीय जनता पार्टी प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों में व्यस्त हो गई है। इसी कड़ी में सूत्रों के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को उनके गढ़ राजगढ़ जिला और खासकर राघौगढ विधानसभा क्षेत्र में घेरने की जिम्मेदारी कांग्रेस से भाजपा में आए केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को दी गई है। दिग्विजय सिंह भी ज्योतिरादित्य सिंधिया की घेराबंदी में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।

सिंधिया पर गद्दारी के आरोप वह पूर्व में लगाते रहे हैं और कहते रहे हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की गद्दारी के कारण ही प्रदेश की निर्वाचित कांग्रेस सरकार को सत्ता से हाथ धोना पड़ा। रानी लक्ष्मीबाई से सिंधिया राजपरिवार की गद्दारी के आरोपों को भी वह लगातार हवा देते रहे हैं।

सिंधिया परिवार और दिग्विजय सिंह परिवार की राजनीतिक अदावत वर्षो पुरानी है। कांग्रेस में रहते हुए भी दिग्विजय सिंह पहले स्व. माधवराव सिंधिया और उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया का मुखर विरोध करते रहे हैं। कौन नहीं जानता 1993 में दिग्विजय सिंह के विरोध के कारण ही स्व. माधवराव सिंधिया प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं बन पाए थे और इसी विरोध के चलते ही हाईकमान के चहेते होने के बावजूद भी ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस छोड़कर भाजपा ज्वाइन करनी पड़ी थी।

भाजपा की सोच है कि ग्वालियर चंबल संभाग में सिंधिया के प्रभा मंडल के चलते पार्टी को जीत तभी मिल पाएगी जब दिग्विजय सिंह को उनके घर में ही घेर लिया जाए। जिससे वे प्रदेश और खासकर ग्वालियर चंबल संभाग में कांग्रेस को जिताने की अपनी भागीदारी पूर्णत: से नहीं निभा पाएं। इसी रणनीति के चलते ज्योरादित्य सिंधिया दिग्विजय सिंह के गढ़ में पिछले दिनों दिग्विजय सिंह के गढ़ राघौगढ़ का दौरा कर आए।

राघौगढ़ में दिग्विजय सिंह का इतना प्रभाव है कि यहां से शिवराज सिंह चौहान भी उनके मुकाबले चुनाव नहीं जीत पाए थे। दिग्विजय सिंह परिवार के हारने की पटकथा राघौगढ़ में अभी तक लिखी नहीं गई है। सिंधिया ने यहां रात्रि विश्राम भी किया और कार्यकर्ताओं से वन टू वन मुलाकात भी की। राघौगढ़ में ज्योतिरादित्य सिंधिया का अंदाज बिल्कुल बदला हुआ था। वह बहुत आत्मीय ढंग से राघौगढ़ के लोगों का दिल जीतने में जुटे हुए थे।

बताया जाता है कि वह जाते-जाते अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को डेढ़ साल बाद होने वाले चुनाव में भाजपा की जीत के लिए पूरी ताकत से लग जाने की जिम्मेदारी दी। सिंधिया एक साल पहले भी दिग्विजय सिंह को उनके गढ़ में तगडी मात दे चुके हैं। जब उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री जी के विश्वासपात्र मूल सिंह के बेटे हीरेंद्र सिंह को भाजपा में शामिल कराया। चर्चा है कि अगले चुनाव में दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह को भाजपा उम्म्ीदवार के रूप में हीरेंद्र तगडी चुनौती दे सकते हैं।

लगभग दो साल पहले दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की सांठगांठ के कारण कांग्रेस में अप्रासांगिक हो चुके ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ भाजपा ज्वाईन कर ली थी। अपने पिता स्व. माधवराव सिंधिया के निधन के कारण 2001 में ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस में शामिल हुए थे और पार्टी ने उन्हें गुना शिवपुरी संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में प्रत्याशी बनाया था। कांग्रेस टिकट पर ज्योतिरादित्य सिंधिया चार बार लोकसभा चुनाव में विजयी रहे थे।

2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद यह आशा बंधी थी कि कांग्रेस उन्हेें मुख्यमंत्री बनाएगी। लेकिन दिग्विजय सिंह ने उन्हें न तो मुख्यमंत्री बनने दिया और न ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष। कांग्रेस में उनकी ताकत इस कदर कमजोर हो गई कि राज्यसभा चुनाव में भी उन्हें टिकट न देने की पूरी रणनीति तैयार हो गई थी। जिसे भांपकर सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर 22 विधायकों के साथ भाजपा ज्वाइन कर ली थी।

जिसके चलते कमलनाथ सरकार गिर गई। तब दिग्विजय सिंह ने उन पर कांग्रेस से गद्दारी का आरोप लगाया था। साथ ही उन्हें रानी लक्ष्मीबाई के साथ सिंधिया खानदान के कथित धोखे की भी याद दिलाई थी। सिंधिया के भाजपा में आने के बाद दिग्विजय सिंह और उनके समर्थक कई बार यह आरोप दोहरा चुके हैं। हालांकि इसके बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने रानी लक्ष्मी बाई की समाधि पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

इस तरह से उन्होंने सिंधिया राजघराने का 160 साल पुराना इतिहास बदलने की सार्थक कोशिश की और अपने आलोचको को भी करारा जवाब दिया। दिग्विजय सिंह यह भी जानते हैं कि ग्वालियर-चंबल संभाग में वर्चस्व स्थापित करने के लिए उन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया से आमने-सामने लड़ना होगा। इसी कारण वह रह-रहकर सिंधिया के खिलाफ गद्दारी के आरोपों को मुखर कर रहे हैं।

इस बहाने दिग्विजय सिंह और कांग्रेस जनता की सहानुभूति भी यह दिखाकर बटोरना चाहती है कि मतदाताओं के बहुमत से चुनी गई सरकार को किस तरह से ज्योतिरादित्य सिंधिया ने गिरा दिया और जनभावनाओं की अवहेलना की। कुल मिलाकर दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया की आगामी विधानसभा चुनाव में जंग इसलिए भी रौचक होगी क्योंकि दोनों के बीच राजनीति के साथ-साथ निजी खुन्नस भी है।

सिंधिया और राघौगढ़ राजपरिवार में 200 वर्ष पुरानी है वर्चस्व की जंग

सिंधिया राजपरिवार और राघौगढ़ राजपरिवार के बीच बुजुर्ग बताते हैं कि वर्चस्व की लड़ाई 200 वर्ष पुरानी है। सन् 1816 में सिंधिया घराने के राजा दौलतराव सिंधिया ने दिग्विजय सिंह के पूर्वज राजा जयसिंह को युद्ध में हरा दिया था।

इसके बाद राघौगढ़ को ग्वालियर साम्राज्य के अधीन होना पड़ा था। 1993 में मुख्यमंत्री पद के लिए प्रदेश में दिग्विजय सिंह और माधवराव सिंधिया का नाम चर्चा में था। लेकिन माधवराव सिंधिया मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी 2018 में मुख्यमंत्री पद की कुर्सी से दूर दिग्विजय सिंह ने किया था और राहुल गांधी की मदद के बाद भी उन्हें निराशा हाथ लगी थी।