अतिक्रमण के कारण विदेशी मेहमानों का तोडा दिल, हर साल कम होते जा रहे है यह प्रवासी- karera News

हिरोज खान करैरा।
सर्दी के मौसम में प्रवासी पक्षियों के बसेरे के लिए प्रसिद्ध मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले के करैरा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली सोनचिरैया अभ्यारण की दिहायला झील राजपुर और दिहायला गांव की सीमा में फैली हुई है। दिहायला झील को दूर देशों से आने वाले प्रवासी परिंदों का हर साल इंतजार रहता है।

पूर्व के वर्षों में जलक्रीड़ा तथा भोजन के लिए यहां हजारों की संख्या में विदेशी परिंदों का आना होता रहा है, परंतु झील में लगातार होती पानी की कमी तथा आसपास हुए अवैध अतिक्रमणों के चलते पिछले चार-पांच वर्षो से यहां आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या में गिरावट आई है।

परंतु यहां आने वाले विदेशी मेहमान पक्षियों की इस बेरुखी पर करैरा अभयारण्य तथा राजस्व अधिकारियों का अब तक ध्यान नहीं गया है। इस वर्ष बमुश्किल झील पर लगभग 1000 प्रवासी परिंदों का आगमन हो सका है, जिनमें विदेशी मेहमान पक्षियों की संख्या नाम मात्र की हैं।

गौरतलब है कि ठंडे इलाकों में शीत ऋतु के दौरान जब बर्फ जमने लगती है और आहार की समस्या हो जाती है तब इन प्रवासी पक्षियों का प्रजनन और भोजन के लिए यहां आना होता है। दूर देशों से आने वाले ये विदेशी मेहमान पक्षियों का यहां अक्टूबर माह के मध्य से यहां आना शुरू हो जाता है, जो करीब चार माह तक यहां रहते हैं और फिर वापस अपने देश को लौट जाते हैं। परंतु झील में पानी की कमी और लगातार बढ़ते अतिक्रमण के चलते मेहमान पक्षियों के आगमन में कमी आई है साथ ही देशी परिंदे भी अब यहां कम ही देखने को मिलते हैं।

झील में इन मेहमान परिंदों की होती रही है आवक
करैरा अभयारण्य स्थित दिहायला झील पर विशेष तौर पर पेंटेड स्ट्रोक, लौह सारस, पैराडाइज, फ्लाईकैचर, गोल्डन औरियल, कामोरंट, मोरहंस जैकाना, ग्रैट स्पोटेड ईगल, किंगफिशर हेरोइन, आइबिस क्रेन, बारहेडेड गीज, पेलीकेन, फलाईमेनगो, साइबेरियन क्रेन कोमन टेल, स्पूनविल, सावकलर, विजियन विदेशी मेहमान तथा भारतीय पक्षियों में पनकौआ, खेरा, भारतीय सारस, सफेदबाज, कालाबाज, जांघिल, घोंचिला, गिरिया, पिट्टो, नीलकंठ, छोटा बाबुई बटन, गजपाउन, जंगली मैना, उल्लू आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं।

झीलों से सिंचाई के लिए पानी लिया जा रहा

सिंचाई के लिए पानी लिया जाना एक बड़ा कारण जरूर है। इस वजह से झीलों का जल संग्रह क्षेत्र सिमट जाता है। नतीजतन परिंदे पारंपरिक डेरों से मुंह मोड़ लेते हैं। हालांकि गहरी झीलों के साथ यह समस्या नहीं है। मध्य प्रदेश के शिवपुरी की दिहायला झील में अभी भी करीब पंद्रह-पंद्रह हजार पक्षी डेरा डाले हुए हैं।

सिंचाई की समस्या से निपटने के लिए जरूरी है कि जिन झीलों के जल संग्रह क्षेत्र में किसानों की जमीनें आती हैं, उन्हें पर्यटन उद्योग से होने वाले लाभ से जोड़ जाए और उनकी कृषि भूमि के अनुपात में कुल लाभ का हिस्सा उन्हें भी दिया जाए। ऐसा होता है तो किसान उस जमीन में खेती नहीं करेंगे और उन्हें आजीविका के लिए पर्यटन से आमदनी होने लगेगी। वे फिर झीलों का संरक्षण और परिंदों की चिंता भी करेंगे।

पक्षियों के शिकार से पड़ा असर

शिकार की घटनाएं होती हैं। बीते साल दिहायला झील में पानी में जहर डालकर कुछ पक्षियों को मारा गया था, जिसकी पुलिस कार्रवाई भी की गई थी। जिन झीलों में आवास, आहार और प्रजनन का अनुकूल वातावरण है, उनका पर्याप्त संरक्षण और पक्षी-प्रवास के दौरान सुरक्षा व्यवस्था जरूरी है। इन इंतजामों की कमी के कारण ही देश की कई झीलों में साईबेरियन क्रेन (सारस) और पेलिकन जैसे अहम पक्षी नहीं आ रहे हैं।