कांग्रेस की कमलनाथ सरकार का तख्ता पलटने का सिंधिया को मिला इनाम: बने नागरिक उड्डयन मंत्री - Shivpuri News

शिवपुरी। कांग्रेस की कमलनाथ सरकार का तख्ता पलटने का ईनाम केन्द्रीय मंत्री के रूप में आखिरकार ज्योतिरादित्य सिंधिया को मिल गया है। भाजपा ने उन्हें राज्यसभा सदस्य पहले ही बना दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल विस्तार में श्री सिंधिया को उस नागरिक उड्डयन मंत्रालय का प्रभार सौंपा है। जिसका जिम्मा तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार में उनके पिता स्व. माधवराव सिंधिया भी संभाल चुके हैं।

भाजपा सरकार में ज्योतिरादित्य सिंधिया का रूतबा भी बढ़ा है। कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार में सिंधिया स्वतंत्र प्रभार के राज्यमंत्री के रूप में कार्य कर चुके हैं। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने उनकी क्षमताओं पर विश्वास कर उन्हें केबिनेट मंत्री का दायित्व सौंपा है। इस मायने में भाजपा में सिंधिया का रूतबा बढ़ा है। इससे भाजपा में सिंधिया के महत्व और प्रभाव को समझा जा सकता है। संगठन में भी सिंधिया समर्थकों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

भाजपा के शासनकाल में प्रदेश और देश में जिस तरह से सिंधिया को सम्मान मिल रहा है। उससे प्रदेश की राजनीति में भी एक अहम बदलाव आगामी दिनों में देखने को मिल सकता है। सिंधिया के रूप में भाजपा को एक ऐसा मिल सका है, जिसकी जनता में अच्छी पकड़ है और वह युवा भी हैं तथा उसके हाथ में प्रदेश सौंपकर निश्चिंत रहा जा सकता है।

कांग्रेस में राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके सुपुत्र राहुल गांधी की नजदीकी के बाद भी प्रदेश में ज्योतरादित्य सिंधिया को कदम-कदम पर दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। ज्योतिरादित्य के प्रभाव से उनके विरोधी इतने भयभीत थे कि उन्हें प्रदेश की मुख्यधारा से अलग करने के लिए तमाम विरोधों के बावजूद उन्होंने आपस मेें हाथ मिला लिया था।

सिंधिया के मुख्य विरोधियों में दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, अजय सिंह और अरूण यादव की गिनती की जाती है। कांगे्रस में 2013 और 2018 के विधानसभा चुनाव में सिंधिया के फेस के आधार पर चुनाव लडऩे की बात चली थी। लेकिन सिंधिया विरोधियों ने इसका विरोध किया।

जिसके चलते 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी और 2018 में भी स्पष्ट रूप से सिंधिया को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया। लेकिन चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाकर जनता में यह संदेश दिया कि सत्ता में आने पर मुख्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया होंगे।

जिसके परिणामस्वरूप सिंधिया के प्रभाव वाले ग्वालियर चंबल संभाग में भाजपा को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा और संभाग की 34 सीटों में से 26 सीटों पर कंाग्रेस ने विजयश्री हांसिल की। भाजपा सिर्फ 6 सीटों पर सिमट गई। प्रदेश में कांग्रेस को 2018 के चुनाव में सत्ता में लाने में मुख्य रोल ग्वालियर चंबल संभाग में कांग्रेस को मिली भारी जीत का था।

230 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस ने 114 और भाजपा ने 109 सीटों पर जीत हांसिल की तथा सपा बसपा एवं निर्दलीय विधायकों के समर्थन से कांग्रेस को स्पष्ट रूप से बहुमत मिल गया। जब मुख्यमंत्री बनने की बात आई तो सिंधिया विरोधियों ने हाथ मिलाकर उन्हें दौड़ से बाहर कर दिया और कमलनाथ मुख्यमंत्री बन गए।

सिंधिया समर्थक विधायकों को कम महत्वपूर्ण विभाग दिए गए और प्रशासन में भी सिंधिया समर्थक मंत्रियों की कोई कदर नहीं रही। विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव में जब गुना शिवपुरी संसदीय सीट पर मोदी लहर के कारण ज्योतिरादित्य सिंधिया को पराजय मिली तो कांग्रेस में उनके विरोधियों के हौंसले और मजबूत हो गए तथा उन्होंने सिंधिया को जलील करने का कोई मौका नहीं छोड़ा।

जब सिंधिया ने मुख्यमंत्री कमलनाथ को जनता से किए गए वायदों की याद दिलाई तथा कहा कि वायदे पूरे नहीं हुए तो मुझे सड़क पर उतरना होगा। इस पर कमलनाथ का जबाव था कि सिंधिया चाहे तो सड़क पर उतर जाएं। प्रदेश में 2020 के प्रारंभ में दो सीटों पर राज्यसभा के निर्वाचन की बात आई तो सिंधिया विरोधियों ने सांठगांठ कर उन्हें टिकट की दौड़ से बाहर करने की रणनीति बुनी।

ऐसी स्थिति मेें सिंधिया के पास दो ही विकल्प थे, या तो वह अपमानित होकर उस पार्टी में बने रहे जिसमें वह 20 साल से थे या फिर स्वाभिमान को बरकरार रख अपना एक नया राजनैतिक रास्ता चुने। सिंधिया ने ऐसे में दूसरे विकल्प को चुना और चुनते भी क्यों नहीं उनके समर्थक विधायकों ने उनके आव्हान पर मंत्री पद और विधायक पद को न्यौछावर करने का प्रस्ताव उनके समक्ष रखा।

सिंधिया समर्थक 22 विधायकों में से 6 मंत्री थे और उनके विधायक पद से इस्तीफे के पश्चात कांग्रेस सरकार अल्पमत में आ गई तथा प्रदेश में भाजपा की सत्ता में वापसी हो गई। मुख्यमंत्री पद पर शिवराज सिंह चौहान की ताजपोशी हुई। इसके बाद 28 सीटों पर हुए विधानसभा चुनाव में सिंधिया भाजपा के फेस बने और उनके प्रभा मंडल के कारण भाजपा ने 19 सीटों पर विजयश्री हांसिल कर विधानसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर लिया।

भाजपा ने सिंधिया से किए गए वायदों को निभाया। उन्हें राज्यसभा में भेजा और सिंधिया समर्थक मंत्रियों को महत्वपूर्ण पद दिए गए। शिवराज मंत्रिमंडल में 28 मंत्रियों में सिंधिया खैमे के 9 मंत्री हैं। भाजपा ने संगठन में सिंधिया की इच्छा का सम्मान करते हुए प्रदेश कार्यसमिति सदस्यों में अपेक्षा से अधिक सिंधिया समर्थकों को स्थान दिया है।

हाल ही में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश में प्रभारी मंत्रियों की नियुक्ति की है और खास बात यह है कि ग्वालियर चंबल संभाग में भाजपा ने सिंधिया के दबदबे को मानते हुए सिर्फ मुरैना संसदीय क्षेत्र को छोड़कर अन्य संसदीय क्षेत्रों में सिंधिया समर्थक मंत्रियों को प्रभारी मंत्री बनाया है। सिंधिया के अब केन्द्रीय मंत्री बनने से उनके कद में और इजाफा हुआ है।

प्रदेश की राजनीति में सिंधिया का रूतबा बढऩे की संभावना

भाजपा हाई कमान से सीधे सम्पर्कों के कारण प्रदेश में संगठन और सरकार दोनों पर सिंधिया का दबाव रहने की आशा है। ग्वालियर चंबल संभाग में तो भाजपा ने सिंधिया की पकड़ स्वीकार ही कर ली है। लेकिन प्रदेश के अन्य संभागों और क्षेत्रों में भी निकट भविष्य में ज्योतिरादित्य सिंधिया की पकड़ काफी मजबूत रहने की संभावना है।

प्रदेश में 15 साल से भाजपा की सरकार काबिज है। लेकिन अभी तक प्रदेश की राजनीति में कोई ऐसा नेता नहीं था, जो शिवराज सिंह चौहान को चुनौती दे सके। जनता के बीच पार्टी के अन्य नेताओं की तुलना में शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता असंदिग्ध थी। ऐसा नहीं कि प्रदेश के अन्य नेताओं में शिवराज सिंह के प्रति नाराजी नहीं रही हो। पिछले दिनों भाजपा के प्रदेश नेताओं की गुपचुप बैठकों से शिवराज सिंह को चुनौती मिलने की आशंका नजर आने लगी थी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के विरोधी लामबंद होने लगे थे।

लेकिन भाजपा आलाकमान ने महसूस किया कि फिलहाल शिवराज सिंह चौहान का कोई विकल्प नहीं है और पार्टी के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो जनता के मन भावन हो। परंतु अब ऐसा लग रहा है कि भाजपा सिंधिया के चेहरे पर यकीन कर रही है कि वह जनता के बीच लोकप्रिय हैं और उन्हें प्रदेश की राजनीति में शिवराज सिंह का मजबूत विकल्प माना जा सकता है।