अधिकारियों की लापरवाही के कारण रेशम के कीट ने रेशम बनाना किया बंद, अब किसान बर्बाद- kolaras News

हार्दिक गुप्ता @ कोलारस।
भाजपा किसान को आत्मनिर्भर बनाने की बात करती है,लेकिन कोलारस में आत्मनिर्भर किसान बर्बाद होने की कगार पर है,कारण है जिले का इकलौता रेशम केंद्र के उजड़ने के कारण,इस केन्द्र के संचालन होने पर 1 किसान को एक लाख रुपए की आय प्रतिवर्ष होती थी। अब रेशम केंद्र की जमीन पर भू माफियाओं का कब्जा है। केंद्र के झडने का कारण अधिकारियों की लापरवाही सामने आई है।

जैसा कि विदित है कि कोलारस में रेशम केन्द्र की स्थापना 1998 में हुई थी इस केंद्र को रेशम के उत्पादन के करने वाले कीड़े को पालने के लिए सरकार से 25 एकड़ जमीन भी आवंटित हुई थी। इस 25 एकड़ जमीन पर 20 किसान परिवार रेशम की कीड़े का पालन पोषण करते थें प्रत्येक किसान की न्यूनतम आय 1 लाख रूपये प्रतिवर्ष होती थी,लेकिन अधिकारियों की लापरवाही से इस भूमि पर पानी की आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर सके इस कारण यह केन्द्र बर्बाद हो गया।

कैसे बनता था यह रेशम का काकून

रेशम केंद्र की 25 एकड़ जमीन को 20 किसान परिवारों को रेशम की खेती करने को दी गई थी। इस जमीन पर शहतूत नाम के पौधे की पैदावार की जाती थी रेशम के कीट के अंडों को इन शहतूत पौधे पर छोड दिया जाता था। अंडे से किट बनाने की प्रक्रिया में रेशम का उत्पादन होता था

रेशम का कीट मैथुन करके प्रत्येक मादा कीट शहतूत की पत्तियों पर 300-400 अण्डों का अंडा रोपण कर देती है. प्रत्येक अंडे से लगभग 10 दिन में एक नन्हा मादा कीट लार्वा (Caterpillar) निकलता है. फिर लगभग 30 से 40 दिन में, सक्रीय वृद्धि के फलस्वरूप, लार्वा पहले लंबा होता है और फिर सुस्त होकर गोल मटोल हो जाता है अर्थार्त बड़ा हो जाता है.
अब तीन दिन तक निरन्तर अपने सिर को इधर-उधर हिलाकर यह अपने चारों और अपनी लार ग्रंथियों द्वारा स्त्रावित पदार्थ से एक ही लंबे धागे का घोल बनाता है जिसे कोया या ककून (Cocoon) कहते हैं. वायु के संपर्क में आते ही यही धागा सूखकर रेशमी धागा बन जाता है जो लगभग 1000 मीटर लंबा होता है।

शहतूत की पौधा धीरे धीरे कीट खा जाता है

रेशम का कीट शहतूत के पौधे पर ही मैथुन करता है अंडे देता है और इसके पौधे की पत्तियों का वह खाता है। धीरे धीरे इस पौधे की पत्तियों को काट खा जाता था और ककून का निर्माण होता था। जब यह पौधे समाप्त हो जाता था किसान फिर पौधे को लगाते थे और सरकार से मिलने वाले रेशम के कीट के अंडे को पौधे पर प्रत्यारोप करते थे यही प्रक्रिया साल में दो बार दोहराई जाती थी।

एक साल में एक किसान 300 किलो ककून बनाता था

जानकारी मिल रही है कि एक साल में एक किसान 300 किलो ककून का उत्पादन करता था जिसका मूल्य लगभग 1 लाख रुपए होता है,लेकिन 1998 में जब यह रेशम केन्द्र खोला गया था जब इसमें पानी के लिए दो बोर थे,लेकिन साल पूर्व यह बोर सूख गए जिससे पौधों की पैदावार पर असर पड गया और धीरे धीर यहां कोकून की पैदावार भी बंद हो गइ। इस काकून को पैदा करने वाले किसान अब परेशान है कि उनका रोजगार बंद हो गया वही आत्मनिर्भर किसान सूखी जमीन के कारण जमीन पर आ गया।

किसान उद्यम सिंह जाटव ने बताया कि में लगभग 20 वर्षो से काकुन बनाने का काम कर रहा था 8 बीघे के प्लॉट में लगभग 1 क्विंटल काकुन बना लेता था साल में 2 बार काकुन बनता था इससे मेरी आमदनी 1 लाख रुपए साल थी पिछले 2 वर्षो से पानी की समस्या के चलते पत्ती नही लग पा रही थी इस वर्ष बोर लगा ओर अधिकारियों ने बंद कर दिया अब बेरोजगार है

किसान रामहेत जाटव का कहना था कि जब से सरकार ने किसानों को आत्मनिर्भर किसान बनाने का संकल्प लिया हम बेरोजगार हो गए इससे पूर्व हम आत्मनिर्भर थे। जमीन अब बंजर पडी है और उस पर अतिक्रमण शुरू हो चुका है। सब अधिकारियों की लापरवाही के कारण हुआ है वह पानी की व्यवस्था नहीं कर सके इस कारण खेती बंद हो गई।