मैं.शिवपुरी हूॅ: हिम्मत है तो पितामह जैसे बनकर दिखाओ,मातृ भक्ति का जीवंत उदाहरण दिया था - Shivpuri News

ललित मुदगल/शिवपुरी: मै शिवपुरी हूॅ, आज दिन हैं मुझे जंगल से शहर बनाने वाले इस शहर के पितामह कैलाशवासी माधौ महाराज को याद करने का, आज पंचमी हैं और हर वर्ष दीपावली के बाद आने वाली पंचमी को कैलाशवासी माधौ महाराज की जंयती शिवपुरी के गिने चुने लोग मनाते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि मुझे जंगल से शहर बनाने वाले माधौ महाराज की जंयती बडे ही धूम धाम से मनाना चाहिए,सोच कर देखो आप अपना एक घर बनाते हो उसमें 500 से अधिक अपने रिश्तेदार बुलाते हो,लेकिन माधौ महाराज ने पूरा शहर बसाया उनकी जंयती पर सिर्फ चंद लोग...

मै शिवपुरी हूॅ, मुझे जंगल से शहर की ओर ले जाने वाले पितामह माधौ महाराज ने मुझे आजादी से पूर्व एक संपूर्ण विकसित शहर के रूप में बसाया था। जब मप्र में नहीं संपूर्ण भारत में एक विकसित शहर के रूप में पहचान होती थी लेकिन अब भारत तो छोडो इस संभाग का सबसे पिछडा शहर है यह शिवपुरी।

मै शिवपुरी हूॅ, मेरे पितामह ने इस जंगल को शहर बनाया। उन्होने मैसूर रियासत के इंजीनियर जो उस समय के विश्व प्रसिद्व इंजीनियर थे, उन्है मेरा डवलपमेंट की जिम्मेदारी दी थी, इंजीनियर विश्ववरैया की सोच ने आजादी से 50 साल पूर्व आजादी से 50 साल बाद तक की सोच में विकसित किया था। माधौ महाराज शिवपुरी के संस्थापक हैं। जंगल में बसे भील आदिवासियों के एक गांव को उन्होंने ना केवल शहर बनाया परंतु उस समय का सबसे बेहतरीन शहर बनाया। सर्वसुविधा सम्पन्न शहर। जहां सडक़ें थीं, पेयजल के भंडार थे, खुला वातावरण, स्वच्छ पर्यावरण, रेल यातायात और वो सबकुछ जो उस जमाने में कल्पना से भी बाहर हुआ करता था।

सन् 1915 में जब लगभग पूरा का पूरा देश बैलगाडय़िों से सफर करता था, शिवपुरी में रेल चला करती थी। शाम ढलते ही लोग घरों में छिप जाया करते थे, परंतु शिवपुरी में स्ट्रीट लाइटें हुआ करतीं थीं। देश के कई बड़े शहरों से लोग यहां बसने के लिए चले आए थे, आज भी उनकी दूसरी या तीसरी पीढ़ी के लोग यहीं रह रहे हैं।

माधौ महाराज की मातृ भक्ति के उदाहरण से भी शिवपुरीवासी भलीभांति परिचित हैंं। जिन्होंने अपनी मां जीजाबाई की स्मृति में छत्री का निर्माण कराया था और आज भी मां जीजाबाई की प्रतिमा की उसी तरह देखभाल होती है। इतने वर्षों के बाद भी अपनी मां को जीवंत रखना माधौ महाराज की मातृभक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है। उनके द्वारा निर्मित कराई गई छत्री गुणवत्ता में ताजमहल के स्तर की है।

अंतर है तो सिर्फ इतना कि शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में ताजमहल बनवाया था। जबकि माधौ महाराज ने एक कदम आगे बढक़र अपनी मां की याद में छत्री का निर्माण करवाया। माधौ महाराज सांप्रदायिक सद्भाव के जीवंत प्रतीक माने जाते हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव की भावना को धरातल पर माधौ महाराज प्रथम ने ही मूर्तरूप दिया था। छत्री में मंदिर हैं मस्जिद है, गुरूद्वारा है और चर्च भी है।

मै. शिवपुरी हूॅ, इतिहास गवाह है, जिस जिस समाज ने अपने पूर्वजों का अनादर किया वो समाज कभी सम्पन्न नहीं हो पाया। शिवपुरी शहर को अपने पितामह की जंयती बडे ही धूमधाम से मानानी चाहिए। शिवपुरी में इतने निर्माण हुए हैं कम से कम माधौ महाराज का एक संग्रहालय तो चाहिए ही जो आने वाली पीढ़ी को बता सके कि इस शहर को स्थापित करने वाला राजा कितना बुद्धिमान, दूरदर्शी और क्षमतावान था। वो युद्ध नहीं करता था, लेकिन अपनी प्रजा की सुख सुविधाओं को जुटाने के लिए वो सबकुछ करता था जो दूसरे राजा नहीं कर पा रहे थे।