विषय चिंतन का हैं, अब हमारी जिम्मेदारी हैं योग्य नपाध्यक्ष चुनने की, पढ़िए पूरा विश्लेषण - Shivpuri News

शिवपुरी। शहर के विकास की मुख्य धुरी नगर पालिका होती है। जिसके जिम्मे शहरवासियों को साफ और स्वच्छ पानी पिलाने, शहर को स्वच्छ और अतिक्रमण मुक्त बनाने तथा नगर की सुंदरता का भी जिम्मा होता है।

इसके अलावा उसका यह भी दायित्व रहता है कि नगर पालिका की आमदनी बढ़ती रहे और आमदनी के जो-जो स्त्रोत हैं, वहां से लगातार धन की आवक होती रहे ताकि बिना किसी रूकावट के विकास कार्य संपादित हो सकें।

नगर पालिका अध्यक्ष का यह भी दायित्व रहता है कि वह राज्य शासन और प्रशासन से भी समन्वय बनाकर रखें। जिससे नगर पालिका को फंड की कमी न आए तथा उसके जायज काम न रूकें।

लेकिन पिछले कुछ चुनावों से योग्य नगर पालिका अध्यक्ष का चयन न होने का खामियाजा यह शहर भुगत रहा है और एक जमाने में प्रदेश में विकास में अब्बल शिवपुरी अब शायद सबसे पिछड़े जिलों में से एक है।

इसलिए इस बार का नगर पालिका का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है और इसमें शिवपुरी को एक योग्य और विकास के लिए समर्पित नगर पालिका अध्यक्ष की तलाश है।

इस बार नगर पालिका शिवपुरी का अध्यक्ष पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित हुआ है। 10 साल पहले भी यह पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित हुआ था। उस चुनाव में महत्वपूर्ण प्रश्र यह था कि कांग्रेस या भाजपा दोनों दल उम्मीदवार चयन में क्या क्राईटेरिया अपनाते हैं।

टिकट की दौड़ में पार्टी में सक्रिय महिला नैत्रियां शामिल थीं। वहीं नेताओं की धर्मपत्नियां या उनकी रिश्तेदार महिलाएं भी कतार में थीं। मुख्य सवाल यह था कि पार्टी में सक्रिय महिला नैत्रियों को दल टिकट देते हैं अथवा नेताओं को अनुग्रहित किया जाता है।

उस चुनाव में दोनों ही दलों ने पार्टी में सक्रिय महिला नैत्रियों की उपेक्षा कर नेताओं की धर्मपत्नियों को टिकट दिए। भाजपा ने तत्कालीन नगर अध्यक्ष अनुराग अष्ठाना की धर्मपत्नी श्रीमति रिशिका अष्ठाना को उम्मीदवार बनाया। वहीं कांग्रेस ने मंत्री गोविंद सिंह के विश्वास पात्र अजय गुप्ता की धर्मपत्नी आशा गुप्ता को टिकट दिया था।

नगर पालिका चुनाव में जातिगत आधार पर वैश्य उम्मीदवार का पलड़ा भारी माना जाता है। लेकिन भाजपा टिकट न मिलने से नाराज मंजूला जैन ने निर्दलीय रूप से चुनाव मैदान में उतर गईं। जिससे वैश्य मतों का बंटवारा हो गया और भाजपा उम्मीदवार रिशिका अष्ठाना चुनाव जीत गईं।

लेकिन अगले चुनाव में ही इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप भाजपा को अध्यक्ष पद पर हार का सामना करना पड़ा और कांग्रेस के मुन्नालाल कुशवाह चुनाव जीत गए। 6 साल पहले हुए उस चुनाव में अध्यक्ष पद पिछड़ा वर्ग पुरूष के लिए आरिक्षत हुआ था।

मुन्नालाल कुशवाह अपने कार्यकाल में जेल भी हो आए और वर्तमान में सिंधिया के साथ वह भी भाजपा में शामिल हो गए हैं। लेकिन आज भी जब शिवपुरी के विकास की बात होती है तो यशोधरा राजे सिंधिया नगर विकास में श्री कुशवाह की नकारात्मक भूमिका का जिक्र करना नहीं भूलतीं।

वह सभाओं में कहती हैं कि शिवपुरी में नगर पालिका की जो-जो समस्याएं हैं उसके लिए जिम्मेदार तत्कालीन नपाध्यक्ष हैं। जिनके कार्यकाल में शिवपुरी विकास में बहुत पीछे चला गया। न तो घर-घर में सिंध का पानी पहुंच सका और न ही सीवेज योजना का क्रियान्वयन हो सका।

गली-गली में सुअरों का जमावडा और गंदगी का साम्राज्य बना हुआ है। अतिक्रमण की भरमार है। नगर पालिका के चुनाव अब बिल्कुल नजदीक हैं। नगर पालिका अध्यक्ष पद इस बार सामान्य महिला के लिए आरक्षित हुआ है।

किसी भी चुनाव में जब पद महिला वर्ग के लिए आरक्षित होता है तो पहला सवाल यही रहता है कि टिकट पार्टी की सक्रिय महिला नैत्री को मिलेगा अथवा नेताओं की पत्नियां या रिश्तेदार टिकट लेने में सफल रहेंगी।

इस झगडे में अभी तक पलड़ा नेताओं का ही भारी रहा है, जो अपने रिश्तेदार महिला या धर्मपत्नी को टिकट दिलाने में सफल रहे हैं। लेकिन शिवपुरी नगर पालिका अध्यक्ष पद के चुनाव में शायद इस बार मुख्य सवाल यह नहीं है और होना भी नहीं चाहिए।

शिवपुरी के विकास की प्राथमिकता अहम है। ऐसे मेें मुख्य सवाल यहीं है कि टिकट चाहे सक्रिय महिला नेत्री को मिले या नेताओं की पत्नियों को। लेकिन पहले दल और फिर जनता ऐसे उम्मीदवारों को चुने जिनके लिए शिवपुरी का विकास अहम हो।

विकास के लिए समर्पित उम्मीदवार को ही चुना जाना चाहिए। सवाल यह है कि क्या दल और जनता ऐसा इस बार कर पाएंगे। हालांकि अभी तक के अनुभव तो बेहद कड़वे रहे हैं। लेकिन इस बार भी ऐसा ही हुआ तो शिवपुरी का भगवान ही मालिक है।

अब पार्टियो की जिम्मेदारी बनती हैं योग्य प्रत्याशियो की मैदान मेें उतारे। हमारी जन्मभूमि भी शिवपुरी हैं हमे हमारी जन्मभूमि की सेवा के लिए योग्य प्रत्याशी चुने।