जसवंत जाटव: सिंधिया का जादू या जनता का गुस्सा, कौन भारी पड़ेगा / karera News

शिवपुरी। मार्च माह में सिंधिया समर्थक अन्य विधायकों के साथ बैंगलोर पहुंचकर विधायकी से इस्तीफा देने वाले करैरा के पूर्व कांग्रेस विधायक जसवंत जाटव से जब पत्रकारों ने पूछा था कि वह क्यों इस्तीफा दे रहे हैं तो उनका जबाव था कि हमें विधायकी नहीं करनी। इसलिए इस्तीफा दे दिया। कोई जोर जबरदस्ती थोडी है, जो विधायकी करनी पड़े। उनका यह कथन अब उन पर ही भारी पड़ रहा है। 

करैरा उपचुनाव में भाजपा टिकट तो जसवंत जाटव को मिलना तय है लेकिन जनता अब उनसे कह रही है कि जब उन्हें विधायकी नहीं करना तो वह क्यों चुनाव लड़ रहे हैं। विधायक पद के डेढ़ साल के कार्यकाल में जसवंत जाटव ने सिर्फ दल ही नहीं बदला बल्कि अपना व्यवहार बदल जाने के कारण वह इतनी जल्दी अलोकप्रिय भी हो गए। जनता और उनके बीच इतनी दूरियां बढ़ गई कि उन्होंने जनसमस्याओं के लिए आने वाले मोबाइल कॉलों को उठाना ही बंद कर दिया।

जबाव उनका रहता था कि मेरी मर्जी फोन उठाऊं या नहीं उठाउं। उनके कार्यकाल में करैरा में अवैध उत्खनन भी जमकर चला और उन पर इसे संरक्षण देने का आरोप भी लगा। तमाम विरोध के बाद भी प्रशासन कल्याणपुर खदान के अवैध उत्खनन को सत्ता के संरक्षण के कारण नहीं रोक पाया।

कांग्रेस के जिन 22 विधायकों के इस्तीफे के कारण उनके क्षेत्र में उपचुनाव हो रहा है, उनमें सबसे कठिन डगर जसवंत जाटव की मानी जा रही है। करैरा विधानसभा क्षेत्र में बसपा की मजबूती के बाद भी पिछले दो विधानसभा चुनावों से कांग्रेस भारी बहुमत से जीत रही है। यह भी इस उपचुनाव में भाजपा के समक्ष एक बड़ी बाधा है।

दूसरा कारण यह भी है कि पिछले तीन विधानसभा चुनावों में बसपा से दमदारी से चुनाव  लड़े प्रागीलाल जाटव इस बार कांग्रेस टिकट के प्रबल दावेदार हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या क्षेत्र में अच्छा जनाधार रखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया चमत्कार दिखाकर इस सीट को भाजपा की झोली में डाल पाएंगे या फिर भाजपा इस सीट पर विजय प्राप्त करने के लिए उम्मीदवार बदलने का साहस दिखाएगी।

करैरा विधानसभा क्षेत्र में लगभग 2 लाख 40 हजार मतदाता हैं। इनमें सर्वाधिक संख्या अनुसूचित जाति वर्ग के मतदाताओं की है। यह संख्या लगभग 80 हजार है। इनमें 40 हजार जाटव मतदाता हैं। इसके अलावा 15 हजार यादव, 15 हजार लोधी, 10-10 हजार ब्राह्मण, मुसलमान और आदिवासी मतदाता हैं।

वैश्य वर्ग के मतदाताओं की संख्या भी लगभग इतनी है। क्षेत्र में 15 से 20 हजार गड़रिया मतदाता हैं। 2003 में गड़रिया मतदाताओं की एकता के कारण इस सीट से बसपा प्रत्याशी लाखन सिंह बघेल भी चुनाव जीत चुके हैं, जो अब कांग्रेस में हैं।

2008 के विधानसभा चुनाव से करैरा सीट अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हुई है। 2008 में करैरा सीट से भाजपा प्रत्याशी रमेश खटीक लगभग 35 हजार मत प्राप्त कर जीते थे और उन्होंने बसपा प्रत्याशी प्रागीलाल जाटव को लगभग 12 हजार मतों से पराजित किया था।

कांग्रेस इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रही थी। लेकिन 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने प्रत्याशी रमेश खटीक को बदल दिया और उनके स्थान पर बाहरी प्रत्याशी ओमप्रकाश खटीक को टिकट दे दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि इस सीट से कांग्रेस प्रत्याशी शंकुतला खटीक लगभग 10 हजार मतों से विजयी रहीं। उन्हें 59 हजार से अधिक, भाजपा प्रत्याशी ओमप्रकाश खटीक को 49 हजार और बसपा प्रत्याशी प्रागीलाल जाटव को 45 हजार मत प्राप्त हुए।

चुनाव जीतने के बाद शंकुतला खटीक भी विवादों में आई ओर उन पर टीआई से विवाद के बाद आपराधिक प्रकरण भी कायम हुआ। इस कारण कांग्रेस ने उनका टिकट काटकर उनके स्थान पर जसवंत जाटव को उम्मीदवार बनाया। जसवंत जाटव पहली बार चुनाव लड़ रहे थे।

प्रत्याशी बदलने के कारण कांग्रेस को एंटीइंकंबेंसी फैक्टर का सामने नहीं करना पड़ा। भाजपा ने भी कांग्रेस प्रत्याशी की राह आसान कर दी। भाजपा ने पूर्व विधायक रमेश खटीक को टिकट न देते हुए 2013 के चुनाव में खड़े हुए ओमप्रकाश खटीक के सुपुत्र राजकुमार खटीक को टिकट दिया। जिसके परिणामस्वरूप कांग्रेस ने करैरा सीट 15 हजार मतों से जीती।

कांग्रेस प्रत्याशी जसवंत जाटव को 64 हजार से अधिक मत मिले। भाजपा प्रत्याशी राजकुमार खटीक को 49 हजार से अधिक तथा बसपा प्रत्याशी प्रागीलाल जाटव को 40 हजार मत प्राप्त हुए। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की राह पार्टी के बागी प्रत्याशी रमेश खटीक ने भी रोक दी थी। वह निर्दलीय रूप से लड़े और 10 हजार से अधिक मत ले गए।  अब आईये थोड़ा उपचुनाव की भी चर्चा कर लेते हैं।

अभी तक यह तय है कि जसवंत जाटव भाजपा की ओर से उम्मीदवार होंगे। ऐसे में भाजपा में भितरघात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। 2018 में पूर्व विधायक रमेश खटीक भाजपा से बगावत कर निर्दलीय रूप से चुनाव लड़ चुके हैं। हालांकि फिर वह भाजपा में आ चुके हैं।

लेकिन टिकट की महत्वाकांक्षा कहीं न कहंीं उनके मन में अवश्य है और उनके निर्दलीय रूप से चुनाव लडऩे की संभावना खुली हुई है। रमेश खटीक ने अपने पत्ते भी नहीं खोले हैं। उपचुनाव में कांग्रेस की ओर से दावेदारों की कोई कमी नहीं हैं। सिंधिया दरबार में हाजरी बजाने वाले नेता ओैर कार्यकर्ता कांगे्रस से टिकट मांग रहे हैं। इनमें पूर्व विधायक शंकुतला खटीक भी है। जिन्होंने सिंधिया के पार्टी छोडऩे के बाद मीडिया से कहा था कि वह महाराज के साथ हैं।

लेकिन टिकट की चाह के कारण वह फिर से कांग्रेस में आ गईं। सिंधिया खैमे की राजनीति करने वाले सेवानिवृत डिप्टी कलेक्टर केएल राय भी महज टिकट के  लिए कांग्रेस में हैं। सिंधिया समर्थक माने जाने वाले योगेश करारे और मानसिंह फौजी भी कांग्रेस से टिकट मांग रहे हैं।

ये सभी सिंधिया समर्थक हैं और कांग्रेस आलाकमान के मन में कहीं न कहीं यह बात अवश्य है कि जीतने के बाद वह सिंधिया के साथ जा सकते हैं। इनके टिकट प्राप्ति में यहीं प्रमुख बाधा है। इसी बीच खबर यह है कि पिछले तीन विधानसभा चुनाव से बसपा प्रत्याशी रहे प्रागीलाल जाटव भी पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ से मिल आए हैं। वह पूर्व विधायक लाखन सिंह बघेल के साथ कमलनाथ से मिले हैं।

बसपा के पूर्व विधायक लाखन सिंह इस समय कांग्रेस में हैं। ऐसी स्थिति में प्रागीलाल जाटव के कांग्रेस उम्मीदवार बनने की संभावना अधिक है और उनकी उम्मीदवारी भाजपा प्रत्याशी जसवंत जाटव की नाक में दम कर सकती है। क्योंकि प्रागीलाल का एक खुद का मजबूत वोट बैंक है।

भाजपा भी करा रही है करैरा में सर्वे

कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा भी करैरा में सर्वे करा रही है कि किस उम्मीदवार की दम पर वह जीत हांसिल कर सकती है। सर्वे के परिणाम यदि प्रतिकूल रहे तो भाजपा जसवंत जाटव को किसी निगम मंडल में एडजस्ट कर जीतने योग्य प्रत्याशी को टिकट भी दे सकती है।

ऐसी अटकलें भी राजनैतिक क्षेत्रों में जोर शोर से चल रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि यदि ऐसा हुआ तो उस शर्त का क्या होगा, जिसके अनुसार कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा में आने वाले सभी पूर्व विधायकों को उपचुनाव में टिकट देने का आश्वासन दिया गया था। 
अशोक कोचोटा, लेखक शहर के वरिष्ठ पत्रकार एंव सांध्य दैनिक तरूण सत्ता के संपादक हैं