नरवर की राजकुमारी के प्रेम में कैद हो गए थे शूरवीर प्रतापी महोबा के राजकुमार उदल,मुक्त कराने किया था अल्हा ने आक्रमण

शिवपुरी। जिले में स्थित नरवर किले में 12 वीं शताब्दी में प्रतापी राजा मकरंदी का राज हुआ करता था। राजा मकरंदी की एक छोटी बहन राजकुमारी फुलवा थीं। राजकुमारी फुलवा उस समय भारत देश की सुंदर राजकुमारियों में से एक थी। ऐसी किवदंती चली आ रही है कि राजकुमारी को फूलों से तोला जाता था। राजकुमारी के सौंदर्य की पूरे भारत देश के छोटे एवं बड़े राजघरानों एवं आम जनता में चर्चा बनी रहती थी। हर व्यक्ति राजकुमारी के सौंदर्य को देखने के लिए लालायित रहता था।

उस समय आल्हा और उदल दो भाई बड़े ही शूरवीर एवं प्रतापी योद्धा थे छोटा भाई उदल सौंदर्यवान था। दोनों भाई ज्यादातर भ्रमण पर रहते थे। वह भ्रमण करते हुए एक बार नरवर आए। जब ऊदल ने प्रथम बार राजकुमारी को देखा तो वह राजकुमारी को देखकर मंत्रमुग्ध हो गए और राजकुमारी से मन ही मन प्रेम करने लगे। उस समय आल्हा-उदल के पराक्रम की ख्याति चारों ओर फैली हुई थी।

राजकुमारी फुलवा को जब आल्हा- उदल की वीरगाथाओं और उदल के सौंदर्य के बारे में पता चला तो कहीं ना कहीं उनके मन में उदल से मिलने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। कुछ समय पश्चात उदल राजकुमारी से मिलने के लिए नरवर आए और पूरी जांच पड़ताल करने के पश्चात उस मालिन के पास पहुंचे जो राजकुमारी के लिए फूलों का गजरा बना कर ले जाती थी।

उदल ने मालिन से निवेदन किया कि वह कल मेरा बनाया हुआ गजरा राजकुमारी के लिए ले जाएं (क्योंकि उदल को विशेष एवं सुंदर गजरा बनाने में महारत हासिल थी) वह मालिन मान गई और दूसरे दिन उदल के द्वारा बनाया हुआ गजरा वह राजकुमारी के लिए लेकर गई।

राजकुमारी को वह गजरा बहुत पसंद आया तथा राजकुमारी ने मालिन से पूछा कि आज से पहले तो तुमने कभी ऐसा गजरा नहीं बनाया यह किसने बनाया है, इस बात पर मालिन ने राजकुमारी को उत्तर दिया कि यह गजरा महोबा से आई हुई एक गजरा बनाने वाली ने बनाया है। राजकुमारी ने मालिन से कहा कि मुझे गजरा बनाने वाली से मिलना है तदोपरांत मालिन उदल को महिलाओं के भेष में राजकुमारी के पास ले गई। जब वह राजकुमारी के पास पहुंचे तब ऊदल ने राजकुमारी को अपना असली स्वरूप दिखाया।

राजकुमारी उदल के सौंदर्य को देखकर मुग्ध हो गई तथा राजकुमारी ने उदल को अपने महल के तलघर में छुपा लिया तथा कई महीनों तक उदल राजकुमारी के महल में ही छुपे रहे। तभी एक बार राजकुमारी को फूलों से तोला गया तो उनकी तुला समतल नहीं हुई। जिससे राजा मकरंदी समझ गए कि राजकुमारी का किसी पुरुष के साथ स्पर्श हुआ है तथा इनका सतीत्व भंग हो चुका है। तुरंत राजा ने महल के सैनिकों को आदेश दिया कि राजकुमारी के महल की तलाशी करवाई जाये।

जब महल की तलाशी की गई तो राजकुमारी के महल के तलघर में सैनिकों ने उदल को सोता हुआ पाया। राजा ने उदल को तुरंत गिरफ्तार करवा कर हवापौर के ऊपर एक भक्छी बनी हुई थी उसमें ऊदल को कैद कर दिया गया। तब से वह भक्छी उदल भक्छी कहलायी।
उदल जब 6 माह तक अपने भाई आला के पास नहीं पहुंचे तब आल्हा ने उनकी खोजबीन शुरू की जिससे आल्हा को ज्ञात हुआ कि उनके भाई को नरवर के राजा मकरंदी ने बंदी बना लिया है।

तदोपरांत आल्हा अपने गुरु अमरा गुरु (जिनको शारदा देवी सिद्ध थीं) को नरवर लेकर नरवर आ गए। गुरु की आज्ञा पाकर आल्हा ने युद्ध का एलान किया और नरवर के सुरक्षा द्वार को तोड़ते हुए सैनिकों को मार कर नरवर के किले पर जा पहुंचे। जब नरवर के सभी वीर योद्धा आल्हा से परास्त हो गए तब घायल सैनिकों ने राजा को जाकर बताया कि उदल के भाई आल्हा नरवर किले पर आ चुके है। तब राजा मकरंदी आल्हा के पास घबराते हुए आया और अपना मुकुट उतार कर आल्हा के चरणों में रख दिया तथा क्षमा मांगने लगा।

अमरा गुरु के आदेश से आल्हा ने राजा को छमा कर दिया। राजा ने उदल को तुरंत मुक्त किया तथा राजकुमारी का विवाह ऊदल से करा कर उनको विदा किया। इसकी विस्तृत कहानी इतिहास के पन्नों में अंकित है, तथा आल्हा ऊदल के बुंदेलखंडी लोकगीत (रसिया) में आज भी गाई जाती है।

ज्ञात रहे की नरवर किले की तीन प्रेम कहानियां आज भी इतिहास के पन्नों में अमर है जिसमें राजा नल-दमयंती, ढोला-मारू तथा फुलवा-उदल की प्रेम कहानी प्रमुख रूप से है।
शोध एवं आलेख-देवेंद्र शर्मा(पत्रकार)
पूर्व सदस्य जिला पुरातत्व संघ शिवपुरी
गांधीपुरा नरवर, जिला शिवपुरी मध्य प्रदेश
मो.9893639265