पोहरी। शिवपुरी जिले के पोहरी अनुविभाग के छर्च सब रेंज के इंदुरखी जंगलों में लम्बे समय से सागौन के कीमती पेड़ों की अवैध कटाई का खेल चल रहा है। ग्रामीणों कहना है कि राजस्थान के माफिया उठकर जंगलों में घुसते है और मोटी-मोटी सागौन की लकड़ी को काटकर ट्रैक्टर और अन्य वाहनों में भरकर राजस्थान बॉर्डर पार ले जाकर ऊंचे दामों में बेच देते हैं। यह सिलसिला कई महीनों से लगातार जारी है, लेकिन विभाग की उदासीनता के कारण माफियाओं के हौसले दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे है। ग्रामीणों के अनुसार अब तक सैकड़ों सागौन के पेड़ जड़ों समेत इस तरह काटे गए। जैसे जड़ से उखाड़ दिए गए है। कई बार ग्रामीणों ने पेड़ों को काटते माफियाओं को देखा भी लेकिन उनकी संख्या अधिक होने के कारण ग्रामीण सामने आने से डरते हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग की कार्रवाई सिर्फ कागजों और पोर्ट खिंचवाने तक सीमित है। कभी कभार औपचारिक कार्यवाही कर दी जाती है, लेकिन बड़े नेटवर्क को तोड़ने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते। यही वजह है कि माफिया बिना किसी डर के जंगलों को उजाड़ने में लगे हैं। बावड़ी क्षेत्र के कई हिस्सों में आज भी ताजे कटे हुए पेड़ जमीन पर पड़े हैं. जो विभाग की कथित कार्यवाहियों पर सवाल खड़े करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में यह इलाका सागौन विहीन हो जाएगा और वन्यजीवों का भी अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
डिप्टी रेंजर नवल किशोर शर्मा ने बताया कि कुछ दिन पहले अज्ञात माफियाओं ने लगभग एक दर्जन सागौन के पेड़ काटे थे। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और काटे हुए पेड़ों की जब्त कर लिया गया। इस मामले की पूरी जानकारी उच्च अधिकारियों को भेज दी गई है। उन्होंने दावा किया कि दोषियों की पहचान के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे है।
इस मामले पर डीएफओ सुधांशु यादव ने कहा कि शिकायत गंभीर है और जांच के लिए विशेष टीम गठित कर मौके पर भेजी जाएगी। उन्होंने आश्वासन दिया कि मामले की पूरी जाँच पड़ताल की जाएगी और जो भी इस पेडो की कटाई में शामिल है उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी वही जब तक बड़े स्तर पर कार्रवाई नहीं होती. या एक जंगलों की सुरक्षा माफियाओं के नेटवर्क की कमी के लिए सीमावर्ती इलाकों में गश्त बढ़ाई जाए और विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाए । ग्रामीणों को उम्मीद है कि इस बार प्रशासन में कड़ा कदम उठा पायेगा क्या हालांकि जंगल और सागौन के पेड़ों को बचाया जा सके और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संपदा संरक्षित रह सकें।
जंगलों के हत्यारों पर वन विभाग कब नकेल कसेगा
पोहरी सब रेंज के इंदुरखी जंगलों में जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ अवैध कटाई नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर सीधा हमला है। सागौन जैसी कीमती और दुर्लभ प्रजाति के पेड़ महीनों से धड़ल्ले से काटे जा रहे हैं और विभाग तमाशबीन बना बैठा है। ग्रामीणों की आंखों के सामने जंगल को उजाड़ने का यह काला खेल जारी है, लेकिन न तो सख्त कार्रवाई हो रही है और न ही माफियाओं के नेटवर्क पर कोई लगाम लग रही है। यह कोई सामान्य अपराध नहीं है। यह संगठित गिरोह है, जिसके तार राजस्थान तक फैले हुए हैं।
ग्रामीणों की मानें तो हथियारबंद माफिया रात के अंधेरे में आते हैं, पेड़ों को जड़ों समेत उखाड़कर ट्रैक्टरों में भरते हैं और कुछ ही घंटों में बॉर्डर पार कर जाते हैं। सवाल यह है कि वन विभाग की आंखों पर पट्टी क्यों बंधी है? क्या सीमावर्ती इलाकों में कोई गश्त नहीं होती? क्या विभाग के पास खुफिया तंत्र नहीं है? या फिर कहीं न कहीं मिलीभगत का खेल चल रहा है? वन विभाग की कार्रवाइयों की पोल खुद जंगल की जमीन पर पड़े ताजे कटे पेड़ खोल रहे हैं। कभी-कभार फोटो खिंचवाने वाली औपचारिक जब्ती से - न तो जंगल बचेगा और न ही सागौन के पेड़।
यह बात अब साफ हो - चुकी है कि अगर बड़े स्तर पर कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में यह इलाका सागौन विहीन हो जाएगा और वन्यजीवों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। जंगल सिर्फ लकड़ी का ढेर नहीं, बल्कि - जलवायु संतुलन और जीवन का आधार हैं। डीएफओ ने भले ही जांच - टीम गठित करने और सख्त कार्यवाही का आश्वासन दिया हो, लेकिन - ग्रामीणों का विश्वास अब खो चुका है। यह आश्वासन तब तक बेमानी है, जब तक सीमावर्ती क्षेत्रों में चौकसी नहीं बढ़ाई जाती और विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं होती।
यह मामला सिर्फ पेड़ों का नहीं, यह कानून, प्रशासन और व्यवस्था की साख का भी है। अगर माफिया जंगलों को इस तरह नंगा करता रहा और विभाग कागजों पर कार्यवाही करता रहा, तो यह जनता के विश्वास के साथ सबसे बड़ा धोखा होगा। समय रहते यदि कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो यह अपराधी गिरोह इतना मजबूत हो जाएगा कि उसे खत्म करना असम्भव हो जाएगा। सरकार और वन विभाग को यह समझना होगा कि अब केवल बयान नहीं, बल्कि कार्रवाई चाहिए वह भी ऐसी कि माफियाओं के हौसले चकनाचूर हो जाएं। जंगल हमारी विरासत हैं, और यदि इन्हें नहीं बचाया गया, तो यह अपराध हमारी आने वाली पीढ़ियों के खिलाफ सबसे बड़ा पाप साबित होगा।
ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग की कार्रवाई सिर्फ कागजों और पोर्ट खिंचवाने तक सीमित है। कभी कभार औपचारिक कार्यवाही कर दी जाती है, लेकिन बड़े नेटवर्क को तोड़ने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते। यही वजह है कि माफिया बिना किसी डर के जंगलों को उजाड़ने में लगे हैं। बावड़ी क्षेत्र के कई हिस्सों में आज भी ताजे कटे हुए पेड़ जमीन पर पड़े हैं. जो विभाग की कथित कार्यवाहियों पर सवाल खड़े करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में यह इलाका सागौन विहीन हो जाएगा और वन्यजीवों का भी अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
डिप्टी रेंजर नवल किशोर शर्मा ने बताया कि कुछ दिन पहले अज्ञात माफियाओं ने लगभग एक दर्जन सागौन के पेड़ काटे थे। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और काटे हुए पेड़ों की जब्त कर लिया गया। इस मामले की पूरी जानकारी उच्च अधिकारियों को भेज दी गई है। उन्होंने दावा किया कि दोषियों की पहचान के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे है।
इस मामले पर डीएफओ सुधांशु यादव ने कहा कि शिकायत गंभीर है और जांच के लिए विशेष टीम गठित कर मौके पर भेजी जाएगी। उन्होंने आश्वासन दिया कि मामले की पूरी जाँच पड़ताल की जाएगी और जो भी इस पेडो की कटाई में शामिल है उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी वही जब तक बड़े स्तर पर कार्रवाई नहीं होती. या एक जंगलों की सुरक्षा माफियाओं के नेटवर्क की कमी के लिए सीमावर्ती इलाकों में गश्त बढ़ाई जाए और विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाए । ग्रामीणों को उम्मीद है कि इस बार प्रशासन में कड़ा कदम उठा पायेगा क्या हालांकि जंगल और सागौन के पेड़ों को बचाया जा सके और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संपदा संरक्षित रह सकें।
जंगलों के हत्यारों पर वन विभाग कब नकेल कसेगा
पोहरी सब रेंज के इंदुरखी जंगलों में जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ अवैध कटाई नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर सीधा हमला है। सागौन जैसी कीमती और दुर्लभ प्रजाति के पेड़ महीनों से धड़ल्ले से काटे जा रहे हैं और विभाग तमाशबीन बना बैठा है। ग्रामीणों की आंखों के सामने जंगल को उजाड़ने का यह काला खेल जारी है, लेकिन न तो सख्त कार्रवाई हो रही है और न ही माफियाओं के नेटवर्क पर कोई लगाम लग रही है। यह कोई सामान्य अपराध नहीं है। यह संगठित गिरोह है, जिसके तार राजस्थान तक फैले हुए हैं।
ग्रामीणों की मानें तो हथियारबंद माफिया रात के अंधेरे में आते हैं, पेड़ों को जड़ों समेत उखाड़कर ट्रैक्टरों में भरते हैं और कुछ ही घंटों में बॉर्डर पार कर जाते हैं। सवाल यह है कि वन विभाग की आंखों पर पट्टी क्यों बंधी है? क्या सीमावर्ती इलाकों में कोई गश्त नहीं होती? क्या विभाग के पास खुफिया तंत्र नहीं है? या फिर कहीं न कहीं मिलीभगत का खेल चल रहा है? वन विभाग की कार्रवाइयों की पोल खुद जंगल की जमीन पर पड़े ताजे कटे पेड़ खोल रहे हैं। कभी-कभार फोटो खिंचवाने वाली औपचारिक जब्ती से - न तो जंगल बचेगा और न ही सागौन के पेड़।
यह बात अब साफ हो - चुकी है कि अगर बड़े स्तर पर कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में यह इलाका सागौन विहीन हो जाएगा और वन्यजीवों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। जंगल सिर्फ लकड़ी का ढेर नहीं, बल्कि - जलवायु संतुलन और जीवन का आधार हैं। डीएफओ ने भले ही जांच - टीम गठित करने और सख्त कार्यवाही का आश्वासन दिया हो, लेकिन - ग्रामीणों का विश्वास अब खो चुका है। यह आश्वासन तब तक बेमानी है, जब तक सीमावर्ती क्षेत्रों में चौकसी नहीं बढ़ाई जाती और विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं होती।
यह मामला सिर्फ पेड़ों का नहीं, यह कानून, प्रशासन और व्यवस्था की साख का भी है। अगर माफिया जंगलों को इस तरह नंगा करता रहा और विभाग कागजों पर कार्यवाही करता रहा, तो यह जनता के विश्वास के साथ सबसे बड़ा धोखा होगा। समय रहते यदि कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो यह अपराधी गिरोह इतना मजबूत हो जाएगा कि उसे खत्म करना असम्भव हो जाएगा। सरकार और वन विभाग को यह समझना होगा कि अब केवल बयान नहीं, बल्कि कार्रवाई चाहिए वह भी ऐसी कि माफियाओं के हौसले चकनाचूर हो जाएं। जंगल हमारी विरासत हैं, और यदि इन्हें नहीं बचाया गया, तो यह अपराध हमारी आने वाली पीढ़ियों के खिलाफ सबसे बड़ा पाप साबित होगा।
