गुरु आचार्य प्रेमचंद सूरि जी का 92वां दीक्षा दिवस संयम उत्सव के रूप में धूमधाम से मनाया- Shivpuri News

Bhopal Samachar
शिवपुरी। चाहे सांसारिक क्षेत्र में या आध्यात्मिक क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए होशियार, चतुर और चालाक बनने की कोशिश हमेशा नुकसानदायक होती है। प्रगति का सूत्र हृदय की निर्दोषता में निहित है। शुद्ध और सच्चे हृदय से भावपूर्वक गुणवत्तायुक्त कार्य हमें जीवन के विकास के पथ पर अग्रसर कर सकते हैं। जीवन में आगे बढ़ने के तीन सूत्र गुरुवर प्रेमचंद सूरीश्वर जी ने हमें दिए थे। जिनका आज 92वां दीक्षा महोत्सव संयम उत्सव के रूप में यहां मनाया जा रहा है।

आराधना भवन में उक्त विचार पंन्यास प्रवर श्री कुलदर्शन विजय जी महाराज ने धर्मावलंबियों की एक विशाल सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। इस अवसर पर नन्ने-मुन्ने बालक और बालिकाओं ने सुंदर सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर साधु जीवन की विशेषताओं और महिमा को रेखांकित किया। दो घंटे तक चले धार्मिक कार्यक्रम के दौरान सामूहिक सामायिक का लाभ जैन धर्मावलंबियों ने उठाया और साधु उपकरणों की वंदनावली की गई।

धर्मसभा में आचार्य कुलचंद्र सूरि जी, मुनि श्री कुलरक्षित सूरि जी, नवोदित मुनि कुलधर्म सूरि जी और साध्वी शासन रत्ना श्री जी ठाणा 6 आदि भी उपस्थित थी। संयम उत्सव के लाभार्थी मंगलचंद्र जी राजकुमार कोचेटा परिवार रहे। कार्यक्रम के बाद धर्माबलंबियों ने सांवत्सरिक वात्सल्य का लाभ लिया।


पंन्यास प्रवर जी ने गुरू के गुणों का किया बखान

पंन्यास प्रवर कुलदर्शन विजय जी महाराज साहब ने बताया कि गुरूवर हमेशा कहा करते थे कि कोई भी कार्य चाहे वह धार्मिक हो या सांसारिक उसमें भले ही मात्रा (क्वांटिटी) की कमी हो लेकिन गुणवत्ता (क्वालिटी) से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। गुणवत्तायुक्त कार्य ही हमें विकास के पथ पर अग्रसर कर सकता है। वह यह भी कहते थे कि सफलता के लिए स्वस्थ हृदय आवश्यक है।

चाहे धर्मध्यान, व्रत उपवास, तपस्या, प्रभू आराधना कम की जाए लेकिन जितनी भी की जाए उसमें भाव होने चाहिए। उसमें हृदय का जुड़ाव होना चाहिए। गुरूवर अक्सर यह भी फरमाते थे कि होशियारी हमेशा विकास में बाधक होती है। आगे बढऩे के लिए बच्चों जैसा निर्दोष हृदय होना चाहिए। निर्दोष हृदय में न तो विकार होते हैं न ही कषाय और न ही कोई अवगुण।

मामूली घटना ने बदल दी गुरूदेव की जीवन दिशा

गुरूवर प्रेमचंद्र सूरि जी महाराज साहब के व्यक्तित्व का बखान करते हुए जैन संत कुलदर्शन विजय जी ने बताया कि उन्होंने एक छोटे से गांव में साधारण परिवार में जन्म लिया था। जब वह महज 9 वर्ष के थे, उनके पिता का स्वास्थ्य खराब हुआ और डॉक्टरों ने जबाव दे दिया। पिता ने अपने पुत्रों के समक्ष इच्छा व्यक्त की कि अंतिम समय में वह किसी जैन संत के दर्शन करना चाहते हैं। इस पर पूरे गांव में जैन साधू और साध्वी की तलाश की गई। लेकिन किसी भी साधू का उस गांव में वास नहीं था। इस पर बालक प्रताप ने निर्णय लिया कि वह स्वयं साधू वैश धारण कर अपने पिता की इच्छा को पूरा करेंगे।

वह साधू वैश पहनकर अपने पिता के पास आए और पिता ने फिर साधू भगवंत के दर्शन कर जीवन से प्रयाण किया। इस घटना ने बालक के मन पर इतना गहरा प्रभाव डाला कि जब साधू वेश उनके पिता की मृत्यु को सुधार सकता है तो यदि मैं साधू बन जाऊं तो न केवल मेरी बल्कि अनंत जीवों की मुक्ति का कारण मैं बनुंगा। इसी भावना से 11 वर्ष की उम्र मं आचार्य श्री ने दीक्षा ली और 87 वर्षों तक साधू जीवन का पालन कर समाधि ली। उन्होंने शंखेश्वर तीर्थ मेें 108 जिनालय का निर्माण करवाया। अनेक धार्मिक और जनकल्याणकारी कार्य किए तथा वह 14 हजार साधुओं के गच्छाधिपति बने।